Friday, December 12, 2008

उन रातों की सुबह नहीं….

कम्‍बख्‍त छोटे से फैसले को लेकर भी कभी कभी मन जितना उहा पोह में उलझता है शायद उतना तो एक गलत फैसला हो जाने के बाद भी नहीं सोचता। चर्चगेट जाउं या सीएसटी जाउं इन दोनों के बीच का फैसला भी स्‍टेशन पर खडे हर शख्‍स के चेहरे पर फैले सन्‍नाटे को देखकर कभी इधर करवट ले रहा था तो कभी उधर। चार दिनों की दहशत हर एक के अंदर फैल गई। इतनी कि 26 तारीख की काली रात मन के हर कोने में अंधेरा बन गई।
ऑफिस से निकला भी तो 25 दफे सोचा और दस लोगों को बताया। हर आदमी के मन की टोह ली। टिकिट देने वाले से भी पूछ बैठा क्‍यो भाई साहब ये चर्च गेट और सीएसटी कि कितने टिकिट बिके होंगे। जवाब संभलकर और समझकर आता है। पिछले चार दिनों से जमे शक को धीरे से सरकाते हुए वो बोलता है तकरीबन 15 से 20 फीसदी ही रह गए हैं।
दो दिनों पहले दोपहर को हुई फायरिंग की खबर सुनकर तो मुंह का निवाला मुंह में ही रह गया था। नाइट ड्यूटी के बाद भी चेहरे पर रात आंखों से उतरती थी और आतंक का अंधेरा हर तरफ दिखाई देता था। लोकल के गेट पर खडा था तब हवा के थपेडे ऐसे लग रहे थे मानों गोलियां चल रही हो। मन के खाली पन को बार बार भरने की कोशिश पर एक भारीपन हर तरफ दिखाई पड रहा यहां तक कि अंदर खाली पडी लोकल की सीटों पर पसरा पडा था। जो बैठे थे उनके साथ बैठने की इच्‍छा नहीं हुई। क्‍या कहूं साला हर तीसरे के प्रति मन में शक सांसे ले रहा था। हर चेहरा ऐसा लग रहा था मानों कौन कब उठे और गोली मार दे।
खैर, रात भर खबर लगाते और खबरों को देखते पढते सुनते एक पत्रकार होने की चेष्‍टा करने वाले का दिमाग आम आदमी का दिमाग नहीं रहता, ना नुकर और अपने हिसाब की अकड रगों में उछाले मारती है। सीएसटी जाने की तो हिम्मत ही नहीं हुई। चर्चगेट पर उतरा तो मच्‍छी वाले का स्‍टील का टोकना जमीन से जा टकराया। अंदर तक सिंहर गया। चेहरे पर ऐसी सकपकाहट की काटो तो खून नहीं।
दक्षिण मुंबई की पुरानी बिल्‍डिंगों और साफ चिकनी गुलमोहर के पेडों की छाया से लबरेज काली सडकें, दाहिनी ओर से कुछ ही दूरी पर हिलोरे खाता अरब सागर, एक एक लहर के साथ इतिहास समेटता सहेजता। काली स्‍याह सडकों पर हमारे होने की आहट में डर और डर के साथ सामने मुंबई युनिवर्सिटी के उंचे बेखौफ कंगूरे, और उसके आंगन में दिनों बाद निकले महफूज सूरज में क्रिकेट खेलते लोग।
गेट खोलकर अंदर की पगडंडी में कदम रखा, दोनों ओर देखा, दूर दूर तक क्रिकेट खेलते हुए लोग। अधकचरा इतिहास समेटते हैं। अचानक एक पिक्‍चर याद आती है आस्‍था, रेखा, ओमपुरी, नवीन निश्‍चल, बडी कसैली याद है। दूर देखता हूं मैदान में, यही वो जगह है जहां वो चलता है। ओमपुरी प्रोफेसर, प्रगतिवादी, दूसरे आदमी के बारे में दिमाग पर जोर डालता हूं। लेकिन नाम याद नहीं आता। फिर दिमाग पर जोर डालता हूं पर याद नहीं आता। क्‍यों याद नहीं आता, इस पर नहीं सोचता।
एक बार फिर देखता हूं यूनिवर्सिटी। गरमी तेज है गन्‍ने का रस पीकर दाहिनी ओर मुडे। सामने गोल चौराहा है, पुलिस वाले तैनात, इक्‍का दुक्‍का आदमी और आदमी के अंदर अतीत की राख का कालापन। खुदको इराक में पाता हूं। गया नहीं हूं पर महसूस करता हूं। गुमठी के नीचे खडा हूं है तो आसपास की भीड काबुल के किसी बाजार में अपने कभी भी खत्‍म होने का शक थूक की तरह निगलता हूं। फिर वह पेट में पहुंचता है और खौफ में तब्‍दील हो जाता है। वैसे पेट के अंदर खौफ पाले और चेहरे पर सूखी हुई सांसों के तेज होने और धीमें होने के बीच खुदके मरने का शक काफी होता है जिंदा होने के लिए कभी कभी।
सामने एक बडा सा बोर्ड है। मुंबई के आतंकी हमलों में शहीदों को भावभीनीं श्रद्धांजलि, तीन फोटो सामने हैं, हेमंत करकरे, अशोक आम्‍टे, और विजय साल्‍स्‍कर। थोडा नजदीक जाकर देखता हूं, मन रूआंसा हो गया। हेमंत करकरे याद आते हैं। दो बार मुलाकात हुई थी एक ही जगह अलग अलग समय में। चहरे की सौम्‍यता को कभी देखकर ऐसा लगा ही नहीं कि कभी पुलिस में होंगे। पेशे से डॉक्‍टर इंजीनियर, और वकील दिखाई दिये।
अप्रैल मई के के दरमियां मीडिया टूर्नामेंट हुए थे। चैनल की ओर से खेलने गया था। मरीन लाइन्‍स के मैदान में। मैच में थोडी देरी थी। मैच यूनिफार्म पहने इधर उधर टल्‍लाता वहां पहुंचा जहां मुख्‍य अतिथि के रूप में हेमंत करकरे बैठे थे। पता नहीं था कि वहां एटीएस चीफ हेमंत करकरे बैठे हैं हां इतना जरूर है कि उनके साथ बैठे दूसरे अधिकारियों को देखकर मैं झेंप गया। लेकिन एक बार उनसे नजरें जरूर मिली। देखते ही हलो सर बोला, वे केवल मुस्‍कुराए और उन्‍होंने गर्दन झुका ली। दूसरी मुलाकात, हमारे मैच होने की शुरूआत में टॉस करवाते वक्‍त हुई। साथी पंकज दलवी के साथ टॉस करवाते हुए भी साथ ही में था। उंची, कदकाठी, गोरा, रंग, लंबा और चौडा भाल, उस गाढी मूंछें। बिल्‍कुल सहज, और सामान्‍य परिचय।
न्‍यूज रूम की अफरा तफरी महसूस करता हूं। 26 तारीख की रात दुनिया के हर तरह के शून्‍य को अपने भीतर समेटने वाली रात, एक खौफनाक खालीपन चारो ओर फैलाने वाली रात, और मुंबई की रोशनी को निगलने वाली रात। न्‍यूज रूम की भाग दौड में सुनता हूं, हेमंत करकरे, आतंकवादी हमले में शहीद, अवाक रह जाता हूं, खुदको देखता हूं, दूसरों को देखता हूं, अपने अंदर दर्ज की गई स्‍मृतियों को अवेरना शुरू करता हूं। अशोक आम्‍टे नहीं रहे, विजय सालस्‍कर भी बनें आतंकियों की गोली का शिकार, परत दर परत रात गहरी होती है, और हर एक खबर रात के सुर्ख काले गहरे अंधरे को भेदती हुए अंदर उतरती है।
अजीब लगता है साध्‍वी मामले को लेकर एटीएस चीफ की रोजाना बाइट लगाता हूं। बुलेटिन स्‍टार्ट होता है। ,खबर पढता हूं, खबर लिखता हूं। किससे बोलूं हेमंत करकरे के विजुअल दो, रिपोर्टर लाया होगा। आज ही तो प्रेस कांफ्रेंस हुई है। मुझे आज का चाहिए। आज का मतलब आज का। ओह, एक विजुअल गुम हो गया है। कौन सी लाइब्रेरी में मिलेगा। कौन सी लाइब्रेरी में, सच एक विजुअल गुम हो गया है। पुराना लगाना होगा।
न्‍यू ताज के पीछे और गेटवे ऑफ इंडिया से बहुत दूर भीड के साथ एक घटना के पुराने निशानों को बातों में निगल रहा हूं। पुलिस वालों के रोके हुए हुजुम, बंद पडे रास्‍तों से इतिहास पानी का रैला बनकर पैरों को गीला करता हुआ अंदर प्रवेश कर रहा है। सारी खबरें, रील दर रील चेहरे और आंखों में पानी बन गई। हथेली पर पसीने की स्‍याही मुठ्ठी में बंद होकर गर्मी चाहती है। चैनलों की आवाजें गूंजती है। अब तक का सबसे बडा आतंकी हमला, अखबारों के शब्‍द सुनाई देते हैं। देढ सौ की मौत, लगातार फायरिंग करते दृश्‍य आंखों में आकार लेकर सुदूर न्‍यू ताज की उंचाई को निहारती हैं। कैमरामेन रिपोर्टर, ओबी वैन, कुछ अधिकारी, राजनीति सफेद कपडों में काले सच को बांधे चल रही है।
अपने चैनल के पत्रकार साथियों के साथ ताज के सामने आ गया था। नीले रूईदार बादलों से घिरे आसमान में निहारता ताज पर आंखे गडाए हुए। सब कुछ ध्‍वस्‍त, इतिहास ध्‍वस्‍त पडा है। दुनिया देख रही है। हर एक कैमरे की आंख वक्‍त को समेट रही है।
मुख्‍यमंत्री आ रहे हैं बहुत लोगों को लेकर आए हैं सिवाय इतिहास बनाने वालों को छोडकर। इतिहास मुंख्‍यमंत्री ने झंडे में लपेटकर फहराया है, शाइनिंग, पावरफुल और ग्रोथिंग इंडिया का। लेकिन इतिहास बनाने वाले तारीखों में दफ्न होते हैं या फिर एक स्‍टेशन पर पटरियों में पिसते हैं या फिर चुपचाप किसी खत्‍म्‍ होते साल के आखिरी महीने के कुछ आखिरी दिनों में रात को बिना कुछ कहे सबकुछ छोडकर सीने पर बारूद खाकर एक खबर बन जाते हैं और गुम हो जाते हैं कुछ घटनाओं की तरह, या फिर सफेद कुर्तों में रूमाल बन जाते हैं शाइंनिंग इंडिया के माथे पर निकला पसीना पोछने के लिए।
कुछ रैपिड एक्‍शन फोर्स और एनएसजी के जवानों को देखता हूं। ऐसा लगता है मानों घने कोहरे और ठंड के बाद किसी ने गुनगुनी धूप में बैठा दिया हो। बडा महफूज लगता है। भरोसा अंगडाई लेता है। हवा में घुली हुई दहशत हवा के साथ घुल रही है। ताज को देखता हूं, जले हुए कंगूरे, वक्‍त के वक्‍त को दिये गए घाव, इतिहास की तारीखों में दर्ज एक कहानी का घायल कथानक। अतीत के झरोखे से बाहर आई अभी अभी एक स्‍मृति। सामने कबूतरों को देखता हूं उडते हैं, डरते हैं, रूकते हैं, चलते हैं, सहमते हैं फिर उडान भरते हैं। मानों फडफडाते पंखों से ताज के गुंबदों को दिलासा दे रहे हैं
अरब सागर शांत है इंडिया गेट के कोने से सटकर कुछ देखना, सुनना और समझना चाहता है। उसके सुदूर कोने से लगता है हर एक लहर के साथ एक उजाला आ रहा हो, दिनों से छाए अंधरे को लीलने। आंखों में सूनापन है, मन में विचार खोजता हूं लेकिन खुदको सुमंदर आवाज में घुलता हुआ पाता हूं। समुंदर को एक बारगी फिर दूर तक देखता हूं। आंखों में क्षितिज खोजने लगा हूं जो सूरज की किरणों में वापस मुझ तक लौट रहा है। शरीर में धूप उतर रही है। अंदर का घना आतंकी काला अंधेरा जल रहा है और आंखों से पानी बनकर बाहर आ रहा है। कबूतरों का झुंड दूर अरब सागर में ताज के लिए सांसे लेने गया है। ताज को देखता हूं, दूर गुंबद से धुंआ उठ रहा है, मौन हो जाता हूं मन नीरज की कविता बन गया है

जीवन कटना था कट गया,
अच्छा कटा, बुरा कटा,
यह तुम जानो,
मैं तो यह समझता हूँ,
कर्जा जो मिट्टी का पटना था पट गया…..
जीवन कटना था कट गया…..

6 comments:

kanchan said...

जख्म भर जाते हैं बाकि रह जाते हैं निशान...
पत्रकार मन की बेचैनी को शब्दों में बखूबी बांधा है..अच्छा है

megha said...
This comment has been removed by the author.
megha said...

well shayad aaj comment tum tak pahunchna hi nahi chahta..tisri baar type kar rahi hun.. khair kehna ye tha.. ki kya baat hai tumhari..I think maine abb tak tumhe theek se samjha hi nahi..tum tou bahut gehre nikle dost..
aaj tak tamhe ek friend ki terah hi pasand kiya.. but I think I admire and respect you a lot more today..

Narendra said...

well said... great thinking , i read it twice to get it deep into my head (tiny piece )

parun said...

Hi Sonubhai, vakai me bahot jabrdast pakad he kalam par.

Regards,
Parun Sharma

Alok Nandan said...

behatar hai, maja aa raha hai par kar