Saturday, January 30, 2010

इश्किया के इश्क को समझना होगा

फिल्म समीक्षा
फिल्म-इश्किया
निर्माता-विशाल भारद्वाज और रमन मारू
निर्देशक-अभिषेक चौबे
संगीत और संवाद-विशाल भारद्वाज
कलाकार-नसीरूद्दीन शाह, अरशद वारसी, विद्याबालन
विशाल भारद्वाज की फिल्मों की दो खासियतें हैं पहली ये कि विशाल फिल्म बनाने के लिए जिस पृष्ठभूमि और उसमें रहने वाले किरदारों चुनते हैं उसका बड़ा ही बारीकी से निरीक्षण करते हैं साथ ही फिल्म के किरदारों और पृष्ठभूमि के बीच उनका तालमेल भी काबिले तारीफ होता है. विशाल की फिल्मों की दूसरी खासियत ये होती है कि उनकी हर फिल्म का स्क्रीन-प्ले काफी मजबूत और कलात्मक होता है. इसे सरल भाषा में कहें तो विशाल फिल्म की पृष्ठभूमि को पर्दे पर उतारने में इतनी कुशलता के साथ काम करते हैं कि पता ही नहीं लगता कि ये फिल्म है या हमारे आसपास की ही सामाजिक पृष्ठभूमि में रचने बसने वाला समाज जिसे भीतर जिंदगी अपने उतार चढ़ावों के साथ एक लय में चल रही है और जिसे हम अपने सामने पर्दे पर चलता देख रहे हैं. शैक्सपीयर के नाटकों ओथेले पर ओमकारा, मैकबौथ, पर मकबूल, और रस्कीन बांड के उपन्यास पर ब्ल्यू अमरेला जैसी फिल्म बना चुके विशाल ने इश्किया में मानवीय प्रवृत्तियों और मनुष्य के भीतर चल रही उलझनों को जिंदगी और उसका हिस्स मानकर बड़े ही सरल औरसहज तरीके से आदमी के अंदर झांकने की कलात्मक कोशिश की है.

फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे, निर्माता विशाल भारद्वाज और रमन मारू हैं . अभिषेक ने विशाल जैसे साथी के साथ इश्किया का न केवल बेहतर निर्दैशन किया है बल्कि फिल्म के सभी किरदारों, के बीच एक बढ़िया तालमेल भी बिठाया है. फिल्म के स्क्रीन प्ले से लेकर संगीत, और संवाद भी विशाल ने लिखे हैँ. जो उम्दा हैं संवादो में लोक अंचल की सौंधी महक आती है. फिल्म इश्किया की कहानी कृष्णा, विद्याबालन खालूजान, इफ्तखार, बब्बन अरशदवारसी के ईर्द गिर्द घूमती है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के आसपास की पृष्ठभूमि में रची-बसी इस कहानी में कृष्णा (विद्याबालन) नाम की एक औरत गोरखुपर के पास एक गांव में रहती है उसका पति विद्याधर बर्मा हथियारों का एक तस्कर है जो एक बड़े माफिया के लिए काम करता है. वह कभी-कभार पत्नी से मिलने आता है. पत्नी कृष्णा अपने पति विद्याधर को बार-बार सरेंडर करने के लिए कहती है लेकिन विद्या को अपनी पत्नी का ये सब कहना रास नहीं आता और वो अपनी मौत का नाटक रचकर उसे छोड़कर चला जाता है. इधर खालूजान (नसीरूद्दीन शाह) और बब्बन (अरशद वारसी) दो चोर रहते हैं वे अपने एक बड़े माफिया मुश्ताक के बीस लाख चोरी करे भागते हैं और भागते-भागते कृष्णा के घर आ जाते हैं.ये दोनों ही उसे पति बर्मा के दोस्त होते हैं और उसे जानते हैं. इस बीच अकेली, जिंदगी से मायूस और हताश कृष्णा खालू जान से इश्क करने लगती है. लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है जब वो इन दोनों को साथ लेकर एक व्यापारी का अपहरण करने की योजना बनाते हैं. इस बीच अरशद और कृष्णा के बीच भी संबंध बन जाते हैं. जिसका पता खालूजान को लग जाता है. और वह अरशद से झगड़ा करता है और कृष्णा से नफरत करने लगता है. इधर जिस व्यापारी को ये लोग अगवा करते हैं ये कृष्णा के पति विद्याधर का बॉस होता है.और कृष्णा अपने पति का पता लगाने के लिए उसका अपहरण करवाती है. उसे पता होता है कि उसका पति मरा नहीं है.
हांलाकि फिल्म का शुरूआती फर्स्ट हाफ फिल्म की लय और गति को समझने के लिए टाइम लेता है और कुछ हद तक इसे उबाउ भी बनाता है. लेकिन फिल्म की कहानी इंटरवल के बाद बेहद ही नाटकीय हो जाती है और एक कौतुलता और सस्पेंस के साथ आगे बढ़ती है.
फिल्म का संगीत काफी अच्छा है. हिन्दी के प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता पर गुलजार का लिखा गीत, विशाल भारद्वाज के संगीत और सुखविंदर और मीका की आवाज में बेहद उम्दा है और दिल को छू जाने वाला है. नसरूद्दीन एक बार फिर ये बता गए हैं कि अभिनय कैसा होता है. हर एक सीन में उनका मंझाहट देखते ही बनती है. विद्या और अरशद वारसी ने भी बेहतर अभिनय किया है. विद्या के लिए यह किरदार सफलता के नये दरवाजे खोल सकता है.
विशाल की पिछली फिल्म कमीने से तुलना करें तो इश्किया में एक लय जिसे समझा जा सकता है. लेकिन फिल्म एक ऑफ बिट सिनेमा बनाने वाले आदमी की है जाहिर है जो लोग ये मानकर चल रहे हैं कि ये एक बेहद कॉमेडी तड़का होगी तो थोड़ा सम्भल जाएं. क्योंकि फिल्म गंभीर है, थोड़ी पेचीदा है, और इसकी पृष्ठभूमि, के अपने कई आयाम हैं इसलिए थोड़ी मशक्कत हो सकती है.
बहरहाल, इश्किया के इश्क को समझना थोड़ा कठिन है नामुमकिन नहीं,. तीन से चार-बार तो नहीं लेकिन हां एक से दो बार देखने लायक जरूर है. कुल मिलाकर ये फिल्म अच्छी है इसमें दशर्क के पास कुछ देखने को नया और रोचक है. कहा जा सकता है दिस इज द टिपीकल मूवी ऑफ विशाल भारद्वाज.

4 comments:

पंकज said...

वाकई!!!
फ़िल्म का नाम, इसकी कहानी, इसके कलाकार और सबसे बढ़कर इसका ट्रीटमेंट इसे देखने के लिए मजबुर कर रहा है! फ़िल्म ज़रूर देखूँगा फिर इस पर चर्चा की जाएगी।

Madhukar said...

एक स्त्री के प्रेम, प्रेम से उपजे भौतिक संतोष,समर्पण एवं उसके टूटने बिखरने का मनोवैज्ञानिक चित्रण है इश्किया, यह उस प्रेम एवं समर्पण के अपमान की ज्वाला में जलती हुई उस स्त्री की कहानी है जो अपने पत्नीत्व एवं स्त्रीत्व के तिरस्कार की असहनीय पीड़ा को मन में दबा कर समाज की तमामो नैतिक वर्जनाओं को त्याग कर अपने एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की गाथा रचती है. वह अपने प्रति हुए अपमान का प्रतिशोध उसी तरह बर्बरता से परन्तु एक कुशल स्त्री की अभिनत शक्ति का प्रयोग करते हुए शांत एवं धीरता से लेती है. यही कहानी है इश्किया.......लेकिन यह फिल्म आम आदमी के लिए नहीं बल्कि सोचने वालों के लिए ज्यादा है. एक बहुत अच्छा प्रयास.......

Kulwant Happy said...

इश्किया का निर्देशन बहुत शानदार किया गया है, जिसके कारण उसकी भूल आम आदमी की पकड़ में नहीं आती।

manmohan said...

wakaee......film shaandaar hai aur tmhara review bhee.