Friday, July 15, 2011

कर्जे का भार

मेरा वजन बढ रहा है इन दिनों
इतना की मेरे पैरों और हाथों की नसें
बमुश्‍किल ही पहुंचा रही है बेहद भारी हो चुके दिल तक
गाढा और उधारी का खून ...

वजन के कारण कम ही देख पाती है मेरी आंखें
आजकल हर चीज को
खासकर उन लोगों को जो मेरे साथ होने का दावा करते हैं
या फिर जिनके साथ रहते मैं महसूस करता हूं
अपने जीने में उनका एक बडा भारी अहसान..

सच मेरे वजन के चलते
मेरे दिल को हर एक धडकन का हिसाब देना पड रहा है इन दिनों
कि बेहद मुश्‍किल हो जाता है कभी-कभी
एक हल्‍के -फुल्‍के कोमन मन का
देह के साथ भारी हो जाना
इतना की नये रिश्‍ते भी भार ही लगे
और हर सांस अंदर की आह के साथ
छिलते रहे संवेदना...

खैर , मेरे वजन के लिए कोई तराजू नहीं है
दुनिया में इस समय कि कहा जाता है
कि पृथ्‍वी के वजन से लाखों करोडों गुना भारी होता है
कर्जे का भार
वैसे कहा तो ये भी जाता है कि
काजल से काला होता है पाप ....

वैसे  ये  दोनों ही बातें
याने कि  मेरा कर्जें में होना और उसे न चुका पाना
मेरे दिल को वाकई में
इस ब्रम्‍हांड के ग्रहों, नक्षत्रों, तारों
और पिंडो से भारी बना देता है
और इस भार को महसूस करते ही
मुझे काली दिखाई देने लगती है ये देह और इसका सम्‍मान
सच काजल से काली...
और मैं खुदको जन्‍म से पापी समझने लगता हूं...

5 comments:

kanchan singh said...

वाकई कर्ज का बोझ बहुत भारी होता हैं. लेकिन कभी-कभी ये बोझ जिंदगी के लिए जरुरी हो जाता हैं.. बहुत गंभीर कविता हैं...

Kulwant Happy said...

क्‍या कहूं, दोस्‍त कर्जे में डूबे व्‍यक्‍ित की भावनाओं को तुमने खूब उकेरा है, तुम शौर्य से ओत पोत कविताएं लिखो,

Sattu Patel said...

BHAI, BADHIYA HAI

नवीन रांगियाल said...

sonu, baba tumhari kavitayen hamesha rajneetik aur samajik chintan liye hoti hai, unme kai cheezon ka sarokaar hota hai, shayad pahali baar tumne aatm avlokan kiya hai ... shayad yeh khud ke andar jhankane koshish hai... aisa hota hai ki hum dheere dheere khud ko dekhna band kar dete hai ....lekin isme karj ke bhoj jaisi koi baat nahi hai...karj ke bojh se tumhara matlab kisi aur bojh se hai ... baharhaal kavita khubsurut hai ... congrts...

सोनू उपाध्‍याय said...

अरे शुक्रिया नवीन.. पर एक बात कहूंगा कविता अक्‍सर पाठक के पास पहुंचकर उसके अपने अर्थों का संसार रचती है.. जो सही भी है क्‍योंकि यह पाठक की अपनी स्‍वतंत्रता है. दूसरे शब्‍दों में जिस तरह एक कवि का अपना रचना संसार है वैसे ही एक पाठक का अर्थ संसार है.. बहरहाल जहां तक इस कविता में कर्जे के भार की बात है तो अपनी ओर से साफ कर दूं ये पैसे वाला ही कर्जा है जो मेरे उपर देढ साल की बेरोजगारी काटते समय चढ गया था.. और मैं जो उन दिनों महसूस कर रहा था वही यह है.
. बाकि कुछ खास नहीं..