Wednesday, December 21, 2011

"दुकान के मार्फत ही जाने जाएंगे घर”

कविता-संग्रह- "नहीं रहने के बाद" 
लेखक- कवि प्रेम शंकर रघुवंशी
कविता-संग्रह समीक्षा सोनू उपाध्‍याय 
सुपर फास्‍ट बन चुके समय,  मोबाइल हो चुकी जिंदगी और मुनाफाई स्‍वार्थ  में डूब रहे समाज में जहां ग्रामीण संस्‍कृति अतीत की छाया में गुम होती जा रही है,   लोक अंचल की सुगंध में महकने वाले पारंपरिक और ग्रामीण जीवन मूल्‍य बाजारू  आंधी की चपेट में आकर गलते जा रहे हैंऐसे सूखते समय में इन्‍हीं मानवीय मूल्‍यों और ग्रामीण पारंपरिक जीवन के पतन पर गंभीर चिंता व्‍यक्‍त करती और उसे विरासत की तरह सहेजती है वरिष्‍ठ कवि प्रेमशंकर रघुवंशी के नये कविता संग्रह नहीं रहने के बाद  की कविताएं.
प्रकृति और पर्यावरण के प्रति एक विशेष लगाव रख उन्‍हें अपना परिवार मानने वाले कवि प्रेमशंकर के लिए कविताएं एक ओर जहां गांव के सुख- दुखउत्‍सव, पर्वत्‍यौहार और उसकी परंपराओं के बीच पलते मानवीय संबंधों के साथ  रचती--बसती रही हैंतो वही जीवन की यायावरी में शामिल हुए कस्‍बों की सादगी, आत्‍मियता और उनके बीच पनपती प्रवृत्‍ति में पककर मानवीय मूल्‍यों के पतन के विरोध में खडा होती रही हैं.  संग्रह में कवि इसी भाव के साथ जहां-तहां खडे मिलते हैं.   लोकभाषा,  लोकजीवन में रची बसी कविताओं से सजे इस संग्रह की कविताएं पूरे देश को उसकी असली लोक गंध से परिचित कराने की अभिव्‍यक्‍त प्रक्रिया से गुजरती हैं. संग्रह की सारी ही कविताएं अपने समय, समाज और परिस्‍थितियों में हो रहे परिवर्तनों के प्रति एक चिंता को व्‍यक्‍त करती है. साथ ही साथ बाजार की अजीब सी दस्‍तक के बीच टूटते घर, छूटते रिश्‍ते और बिखर रहे पारंपरिक मूल्‍यों को बचाने के लिए मानसिक छटपटाहट भी दर्शाती है. जो करया सो भोगया, एकलसूमडा, सन्‍दुकचा, गतराडा, नहीं रहने के बाद भी, नेमावर, नर्मदा की शाम और बेडई  ये सभी वह कविताएं हैं जो इस पूरे देश के ग्रामीण आंचलिक जीवन, उसके क्रियाकलाप, उसके अतीत के नायकों और उसके श्रद्धा के केंद्र बन चुके प्रतीकों को एक आस्‍था के साथ याद कर नमन करने की कविताएं हैं. इसमें भी सन्‍दुकचा और बेडई जैसी कविताएं मानवीय प्रेम की वह कविताएं हैं जहां एक ओर कवि पुराने घर के सन्‍दुकचे के बहाने अपनी पूरी पीढी को याद करता हुआ वतर्मान में आकर ठिठक जाता है, तो वहीं अपने घर में बेडई नाम की भैंस को याद करते हुए उसके साथ जुडे प्रेममय अतीत के तमाम दृश्‍यों को हमारे सामने विराट मानवीय मूल्‍यों के रूप में बदल देता है.

नर्मदा कवि के जीवन में कई-कई रूपकों और प्रतीकों के साथ आई है. कभी वह आस्‍था की नदी है, तो कभी वह कवि के भीतर बहने वाले अतीत की वह पुरातन नदी है जहां उसका अंचल पैदा होकर, खेलता कूदता उसी के किनारे पर विलीन हो गया. इसे भाग्‍य कहें या कुछ और कि अपने जीवन का अधिकांश हिस्‍सा नर्मदा के किनारे बिताने वाले कवि का नर्मदा को यह शायद धन्‍यवाद ही है कि उन्‍होंने नर्मदा पर सबसे ज्‍यादा कविताएं लिखी हैं, लेकिन कमाल तो यह है कि नर्मदा के प्रति आस्‍था में डूबा हुआ कवि अपने मन में नर्मदा केवल नर्मदा के रूप में नहीं बल्‍कि नदी के रूप में बसाता है और उसके किनारे बीतने वाले हर पहर को कई तरह से याद करता है, शायद इसलिए नर्मदा के बहाने नदियों पर 24 से भी ज्‍यादा कविताएं हैं, जो शायद इस संग्रह की सबसे बडी विशेषता है.
बहरहाल प्रकृति के साथ एक आत्‍मिय संबंध बनाकर उसे जीवन पर्यंत अपने सृजन की हर यात्रा में साथ रखने वाले रघुवंशीजी की कविताएं प्रकृति के शोषण के खिलाफ भी उतनी ही अविराम गति से अपनी उपस्‍थिति दर्ज करवाती रही है. पूंजीपतियों की जेब भरने में खाली होते जंगलों, निढाल होते सतपुडा, और कंगाल होते आदिवासी जनों की आवाज बनती इन कविताओं के स्‍वर संग्रह की निढाल होता सतपुडा, सोचना शुरू कर दिया है, लहूलुहान है नदी और जो प्रदुषित करे नदी में भी पूरी जिम्‍मेदारी के साथ शामिल हुए हैं.
संग्रह में नदी श्रंखला की तरह ही देश की राजधानी दिल्‍ली पर दिल्‍ली आने का निमंत्रण से लेकर ग्‍यारहवीं कविता मौजूद है दिल्‍ली में तक दिल्‍ली पर एक पूरी कविताओं की श्रंखला है. जहां कवि सुदूर महानगरों में चल रहे सत्‍ता के षडयंत्रों के चलते कस्‍बाई जीवन को हिकारत से देखने की दृष्‍टि के प्रति बेहद ही संवेदनशील तरीके से अपनी बात कहता नजर आता है. जाहिर है कस्‍बाई और आंचलिक जीवन के भीतर महानगरीय समाज के छल, कपट और लाग लपेट के प्रति भय की आशंका किस तरह से एक भोले भाले जन के मन में एक भय पैदा किए हुए है यह साफ नजर आता है. 
सूरज और पृथ्‍वी के हाथों से निकलकर नौकरी व मनोरंजन के घंटों में तब्‍दिल और लोगों के रिश्‍तों में बाजार बन शामिल हो चुके इस समय में जहां समाज पर संवादहीनता हावी होती जा रही है ऐसे में रघुवंशीजी इस समय की नब्‍ज को भी बहुत ही बारीकी से पहचानते हैं. वे मीडिया, बाजार, राजनीति और उसके छल के लगातार शिकार हो रहे लोकतंत्र पर जिस संवेदनशीलता को जीते हैं, वह सोचने पर मजबूर कर देने वाला है. चुनाव मंथन में हर बार, आर्यावर्त का पवित्र पानी, संविधान के पृष्‍ठ पर, कर्फ्यू के बाद भी, संवादनहीनता के इस दौर में, दुकानें ग्राहकों के नाम से ही जानती है हमें और दुकान के मार्फत ही जाने जाएंगे हमारे घर यह कुछ ऐसी कविताएं हैं जो इस दौर की सच्‍चाई को परत दर परत उघाडती चलती है. यह कविताएं फैशन की तरह लोगों के मन पर हावी हो चुकी विचार शून्‍यता पर कटाक्ष करती हुए पूरी व्‍यवस्‍था पर प्रश्‍न चिन्‍ह उठाती है. वास्‍तव में कविता- “संग्रह नहीं रहने की बाद”” की कविताएं भावना प्रधान, वैचारिक और उन संवेदनशील लोगों की आवाजें हैं जो इस पृथ्‍वी के सौंदर्य में ही अपने जीवन का सौंदर्य देखते हैं, जिनकी आस्‍था लोक अंचल और ग्रामीण संस्‍कृति में रम कर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है और लगातार चिंतित है इस पारंपरिक जीवन मूल्‍यों के बिखराव को लेकर, और भयग्रस्‍त हैं इस बात को लेकर कि जब दुनिया मंडी बन ही रही है तो फिर सच क्‍या होगा जीवन नहीं रहने के बाद.

No comments: