Sunday, February 10, 2008

राज ठाकरे की मराठी अस्‍मिता… और रिपब्‍लिक मुंबई….

शाम को जब ऑफीस में एडिट शूट के बाहर निकला तो एक खबर उडती हुई कानों में पहुंची, दहिसर और गोरेगांव में मारधाड हो रही है आप लोग जल्‍दी निकल जाओ, मेरी स्‍टोरी कट रही थी, खबर जिस आदमी के पास से आई थी वह खुद भी मुंबई का नहीं था पर उसके कहने के तरीके से मुझे इस बात का अंदाजा हो गया कि यह इन दोनों ही इलाकों में से किसी एक में रहता है। मैं सही निकला, वह गोरेगांव का ही था सो थोडा सहमा हुआ भी था।, सहम तो मैं भी गया था क्‍योंकि एक अनुभव इस तरह का मुझे पहले से ही था। इंदौर छोडने के कुछ दिनों पहले ही कुछ ऐसी ही अफरा- तफरी को अपने वेबदुनिया के ऑफीस में महसूस किया था। जब इंदौर में एक जगह पर पूजा पाठ और कर्मकाण्‍ड को लेकर दो समुदाय भिड गए थे। यही तनाव का साया इंदौर में तकरीबन दस बारह दिनों तक रहा। और इसे मैंने काफी करीब से देखा!

बहरहाल, नीचे पहुंचकर बीएमसी देखने वाले अपने पत्रकार दोस्त संतोष थले से खबर की तफ्तीश और इस पूरे माजरे की करीब से गुफ्तुगू करने की इच्‍छा हुई। संतोष ने बताया कि दहिसर में किसी यूपी के आदमी को पीट दिया है! बस, ज्‍यादा तो कुछ खास हुआ नहीं है। हां, राज ठाकरे अभी पुणे में है और नासिक और पुणे मे उसकी अच्‍छी खासी पकड है और यदि वह मुंबई आने पर गिरफ्तार हो जाता है तो जितनी गाडियां भर- भरकर वो ला सकता है शहर की सूरत और फिजा बिगाडने के लिए काफी है।
तकरीबन नौ बज रहा था अपने दिमाग में कई सारे प्रश्‍न लेकर बाहर निकल आया। रोजाना की अपेक्षा अंधेरी स्‍टेशन की तरफ जाने वाली सडके विरान दिखाई पड रही थीं। मुंबई के इतिहास में पहली बार पड रही कंपकंपा देने वाली ठंड के बावजूद मुझे माहौल में एक गर्मी दिखाई दे रही थी। हो सकता है यह केवल मुझे ही दिखाई पड रही हो खासकर उस खबर के सुनने के बाद क्‍योंकि मुंबई का हर स्‍टेशन इतना भीड-भाड वाला है कि आपका एक सामान्‍य मनोविज्ञान दौडा पाना तुक्‍का ही होता है। पर फिर भी राज ठाकरे के बयान के बाद खुदके मध्‍य भारतीय होने का डर मन में तीन दिनों से है। रात को दोस्‍तों के साथ टीवी जल्‍दी बंद करके यही बोलकर सोते हैं कि बेटा जल्‍दी सो जाओ नहीं तो राज ठाकरे आ जाएगा। पर जो हो, तो मैं कह रहा था कि मध्‍यभारतीय होने का जो डर था वह आज कुछ ज्‍यादा ही साल रहा था।

बहरहाल, घर आकर अपने चैनल की यह खबर न तो टीवी पर किसी दूसरे चैनल पर देखने और सुनने को नहीं मिली और न ही कहीं से पता लगी। पर इस खबर को ढूंढने के चक्‍कर में लगे हाथ राज ठाकरे के एक इंटरव्‍यू को देखने का मौका मिला। एक चैनल पर दिखाया जा रहा यह इंटरव्‍यू तब का था जब राज ने शिवसेना छोडकर नव-निर्माण सेना बनाई थी ये और बात है कि अभी तक न तो इस पार्टी की कोई राजनीतिक हैसियत है और न ही इसका कोई राजनीतिक चिन्‍ह है। इसे हम एनजीओ भी कह सकते हैं।

खैर, इंटरव्‍यू के दौरान राज के चहरे पर एक सकपकाहट साफ दिखाई दे रही थी। ये शायद उस समय शिवसेना को छोड एक पार्टी सुप्रीमो की हैसियत से पहली बार मीडिया में सवाल जवाब के फेरे में आने की थी। टीवी एंकर की बातों से पता लगा कि राज ने शायद उस समय भी मुंबई में उत्‍तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों के खिलाफ कुछ इसी तरह की आग उगली थी जैसी वे आज उगल रहे हैं।

राज ने अपने इंटरव्‍यू में खुद को एक आम आदमी बताया और कहा कि वे अपने शहर के बारे में ठीक वैसा ही सोचते हैं जैसा कि आम आदमी। राजनीति के बारे में राज कुछ गोलमाल जवाब दे रहे थे। राज ने कहा कि आज की राजनीति प्रॉब्‍लम पर चल रही है और आज किसी के पास सॉल्‍यूशन नहीं है और वह दो तीन सब्‍जेक्‍ट्स को लेकर ही चल रही है। अपनी आंखों में कुछ सवालों के जवाब खोजते और शिवसेना से अलग होने को गम पाले राज अपने अंदर एक कच्‍ची समझ को गिल रहे थे।
राज ने कहा कि वे एक ऐसा कानून बनाना चाहते हैं जिससे एक राज्‍य के व्‍यक्‍ति को दूसरे राज्‍य में जाने के लिए परमिशन लेनी पडे और ऐसी आवाजाही पर रोक लगे। जब उनसे केन्‍द्र की यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों के बारे में पूछा गया तो राज ने दबी और बुझी हुई आवाज में एक छुटभैया नेता की तरह हकलाते हुए कहा कि वे कोई अर्थशास्‍त्री तो हैं नहीं इसलिए इस पर कुछ नहीं कह सकते। बहरहाल, राज बोलते रहे, और बस बोलते रहे, जोर-जोर के शब्‍दों का इस्‍तेमाल करते रहे।

राजठाकरे ने जो बोला उससे पता लगा कि राजठाकरे की राजनीतिक समझ 1966 में बनी उस शिवसेना के उद्गम स्‍थान पर ही परिपक्‍व हुई है जहां बाला साहब रहते हैं याने मातोश्री। ठाकरे परिवार के आंगन में खेलते-कूदते राज के पास कभी शिवसेना की बडी जिम्‍मेदारी नहीं आ पाई। राज के शिवसेना छोडने का कारण उनकी कुण्‍ठा ही रही कि वे सदा खुद की राजनीतिक इच्‍छाओं का गला घुटता देखते रहे और बाला साहब ठाकरे के भतीजे के अलावा अपनी निजी पहचान को तलाशते रहे।

राज को मुंबई के इम्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर की चिंता है इसलिए वे मुंबई में बढती भीड को कम करना चाहते हैं। मुंबई की इस भीड को यहां एक घर ढूंढते हुए, लोकल में सफर करते हुए और बस की लाइन में खडे होकर महूसस किया जा सकता है। मतलब समस्‍या तो है ठीक वैसी ही जैसी एक बार उत्‍तर भारतीयों की भीड के चलते दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्‍ली में महसूस की थी पर बेचारी राज जैसा दमखम नहीं रख सकी क्‍योंकि कांग्रेस हाइकमांड के नाराज होने से लेकर कांग्रेस पार्टी के वोट कम होने का डर था इसलिए उन्‍हें अपना बयान वापस लेना पडा।

बहरहाल, राज मुंबई पर पडते बोझ को हटाने के लिए हिटलर शाही पर उतर आए हैं। और टैक्‍सी वालों से लेकर लोकल में चल रहे निर्दोष लोगों को पिटवा रहे हैं। वे मानते हैं कि यह एक अभियान हैं जिसकी शुरूआत होनी जरूरी थी। वे बेधडक कह रहे हैं माझी भूमिका, माझा लढा (महाराष्‍ट्र टाइम्‍स में छपा उनका आलेख मेरी भूमिका मेरी लडाई- जो हो रहा है वह अच्‍छा हो रहा है! मराठा मर जाता है पर हटता नहीं भले ही लोगों को मार डाले) याने राज वे सब कुछ करते रहेंगे जिससे वे शिकार की तरह खबर खोजते मीडिया की आंखों में आए और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर सकें। वैसे भी राज के मुताबिक आज की राजनीति प्रॉब्‍लम पर चल रही है सॉल्‍यूशन पर नहीं इसलिए वे सॉल्‍यूशन ही दे रहे हैं। और फिर वे आम आदमी भी हैं और आम आदमी बनकर और आम आदमी की तरह सोचते हुए तो उन्‍होंने जो भी बोला वह सब मुंबई का आम आदमी चाहता है।
राज ने अपने इस आर्टिकल में मुंबई की मराठी अस्‍मिता और संस्‍कृति की को अपनाने की धमकी दे रहे हैं और ये कह रहे हैं कि यदि महाराष्‍ट्र में रहना है तो यहां कि हर चीज को अपनाना होगा। मतलब, राज संस्‍कृति को लादना चाहते हैं याने उसे हिंसक बनाना चाहते हैं यह भूलकर कि दुनिया की कोई भी संस्‍कृति लादी नहीं जाती बल्‍कि वह धारण की जाती है फिर संस्‍कृति हिंसक भी नहीं होती। एक समुदाय विशेष में रहते-रहते व्‍यक्‍ति खुद ब खुद उसे धर्म की तरह धारण करता है। जैसे मुंबई में गणेशोत्‍सव उत्‍तर भारतीय व्‍यक्‍ति उतने ही धूमधाम से मनाता है जितना कि एक महाराष्‍ट्रियन गुजराती समुदाय के गर्बे में शामिल होता है।

ठाकरे साहब ये सब मजबूरी में यह सब नहीं कर रहे और कर भी रहें हैं तो आप में इतना दम नहीं हैं कि इन्‍हें रोक लें। ज्‍यादा दूर तो नहीं आप में यदि दम है तो आप न्‍यूईयर से लेकर वैलेंटाइन डे तक सेलिब्रेट करने वाले महाराष्‍ट्रियन को ही रोककर दिखा दें जो बेधडक होकर आपकी महाराष्‍ट्रियन संस्‍कृति को भुला रहा है। खैर, वैसे जिस छठ पूजा को लेकर आप इनती चिल्‍ला-चोट मचा रहे हैं राज जी वह संस्‍कृति महाराष्‍ट्र की संस्‍कृति को खत्‍म नहीं करेगी बल्‍कि उसे और भी समृद्ध बनाएगी। खत्‍म तो आपके यह बयान करेंगे जो आप इस देश को तोडने के लिए दे रहें हैं। खतरा, छठ पूजा से नहीं है साहब, खतरा तो आपके इस बयान से है जो आप समस्‍या की आड में दे रहे हैं। फिर यह भी ध्‍यान रखें ठाकरेजी की अब दुनिया ग्‍लोबल हो चुकी है फिलहाल हम इस ग्‍लोबलाइजेशन के पहले ही चरण मे हैं दुनिया की संस्‍कृति भी हमारे यहां शामिल होगी जो लगभग-लगभग मुंबई में तो शामिल हो ही चुकी है।

जिस मुंबई को आप समूचा महाराष्‍ट्र मानकर संस्‍कृति और अस्‍मिता की दुहाई दे रहे हो और जिन तथाकथित आप से जुडे मराठी मानुष के लिए दे रहे हो उसमें से मुंबई में रहने वाले कितने हैं जो इस ग्‍लोबल कल्‍चर से परहेज करते हों। ये और बात है कि एक शहर में बढती भीड के कारण वहां के संसाधन कम पड रहे हों और बुनियादी सुविधाओं के लिए लडाई हो रही हो। पर इसके दूसरे राजनीतिक विकल्‍प हो सकते हैं। पर ये नहीं हो सकता है कि एक लोकतांत्रिक देश में आप भाषा संस्‍कृति और जाति के नाम पर किसी को मारो-पीटो और उन्‍हें अपने यहां आने से रोक दो। और फिर आप जिस कानून को बनाने की मांग कर रहे हो तो क्‍या अब आप देशों को छोडकर राज्‍यों और शहरों में भी वीजा और पासपोर्ट बनवाएंगे, देश में ही रिपब्‍लिक उत्‍तर प्रदेश, रिपब्‍लिक बिहार और रिपब्‍लिक मुंबई बनवाएंगे।
सही बात को सही तरह से कहने का तरीका सीखें राज जी यदि मकसद साफ नहीं है तो मत बोलिये आपका तो कुछ खास जाएगा नहीं लुटेंगे-पिटेंगे वे ही जो इस अपने घर में राजनीति के बजाए हो रही लम्‍पटगिरी से बचकर यहां दो वक्‍त की रोटी जुटाने आएं हैं और उन्‍हें तो ये पता ही नहीं है आप हैं कौन? और आपके होने का मतलब क्‍या है? ये और बात है कि उनकी जिंदगी में खलल डालने के लिए अपनी हार को पचा नहीं पा रहे ये लोग यहां भी मुंह मारने उनके पीछे-पीछे आ गए हैं और आपकी फालतू बयान बाजी का जवाब देकर बुलटप्रूफ कारों में बैठकर घर निकल जाते हैं और रह जाते हैं फेरी लगाते, और टैक्‍सी चलाते ये लोग, आपकी सेना की हिटलरशाही का शिकार होने के लिए।
पर जो हो आप ठहरे एक आम आदमी जिसे ज्‍यादा समझाने या बताने की जरूरत भी नहीं है। ये आपकी मर्जी है कि आप उसे माने या न माने। हम तो समझदार आदमी को समझा सकते हैं क्‍योंकि वह तो आम आदमी नहीं होता। और पहले प्रॉब्‍लम को समझता है फिर सॉल्‍यूशन लेकर आता है। आप तो मर्ज जाने बिना ही दवाई पिला रहे हैं वह भी जबर्दस्‍ती।

बेहतर ये होगा राज जी पहले अपनी पार्टी को किनारे से बाहर लाइए ताकि आप ये गुंडागर्दी छोडकर वाकई में राजनीति कर सकें। आपको अभी बहुत सीखने की जरूरत है साहब, तनिक संजीदगी लाइए, आप युवा हैं देश के कर्णधार हैं, ये उल-जलूल बतियाने- गरियाने से कुछ होगा तो नहीं, मतलब आप को, हमारे जैसे नौकरीपेशा और हमारे कुछ दोस्‍त यानी ये चाय वाले और फेरी वाले, आपके इन बयानों से उनकी जान के लाले पड जाएंगे, सडकों और ट्रेनों में चलना मुश्‍किल हो जाएगा।
चलिए फिलहाल टीवी का चैनल बंद कर रहा हूं। वैसे भी कहा जा रहा है मुंबई में इन दिनों एतिहासिक ठंड पड रही है पास न तो रजाई है न गोदडी, वैसे भी मालवा की ठंड के आगे सब फीका है, पर आपके बयानों ने जो सरगर्मियां बढाई है वह भी एतिहासिक ही हैं। खैर, शुभ रात्रि, आशा है आप में कुछ बदलाव जरूर आएंगे।

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