गुरुवार, 10 जून 2021

यह सब आंकड़े हैं. दुख की गिनतियां जिन्हें कोई नहीं गिन पाएगा.!

 
                     हरदा के स्टेशन की एक शाम: तस्वीर बाकायदा मेरा फोन. 

9 मई बीत रही है. आज कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा 4 हज़ार से पार है. मेरे पास सुबह पहुंचा आंकड़ों का अविश्वसनीय नोटिफिकेशन. यानी गिनती ठीक नहीं. यह रोज़ाना हो रहीं मृत्यु में सबसे ज्यादा है. सूचना है कि कोविड संक्रमित तो कम हो रहे हैं लेकिन मरने वालों की संख्या नहीं. लेकिन 4 लाख केस रोज़ होना संकेत है कि महामारी की रफ़्तार बेकाबू है और आने वाले कई 24 घंटे डराने वाले होंगे.

बहरहाल, बीते दो से 3 दिन में केरल डरा रहा है जबकि यूपी सहित राज्यों के गांव दहशत दे रहे हैं. राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली  सहित महाराष्ट्र की कहानियां आपके हिस्से आई होंगी.

सच कहूं तो इन आंकड़ों और तथ्यों का साझाकरण किस विश्लेषण के साथ बताया जाए जबकि आसन्न संकट मृत्यु ही बांट रहा है और सरकार असहाय नजर आ रही हो. वैसे कड़वा सच कहूं तो मुझे सरकार नज़र नहीं आ रही. वह डिजिटल थी और उसका भास मात्र होता रहा. आभास को भास भासता है. यह वर्चुअल की रियल्टी है.

फिलहाल मैं इन आंकड़ों से खुदको डरने नहीं देता. सुबह रोज उठकर यही देखता हूं. मौत की खबरें सुनता हूं. आज गली में पड़ोस की दादी चलीं गईं उन्हें नमन किया और मातृत्व दिवस पर रोती हुई मां से एक दूर की मौसी के नहीं रहने की खबर सुनी जिसके हम बेहद करीब थे.

उधर भोपाल में बहन दूर के रिश्ते में 38 साल के भांजे की अचानक मौत को स्वीकार नहीं कर पा रही और रोज रात को उसे बचा लेने के छूटे हुए जतन साझा करती है. भाभी के भाई 6 दिन से एडमिट हैं उन्हें देखने जाने की बात चल रही है, पत्नी दुःखी है क्योंकि इकलौता भाई एडमिट है, काकी की असमय विदा उसके मन पर शोक बनकर छा गई है.

यह सब आंकड़े हैं. दुख की गिनतियां जिन्हें कोई नहीं गिन पाएगा.
फिर महामारियां भी मदद, आमद की खबरें और मृत्यु के गिरते बढ़ते आंकड़े कहां गिनती है..!

सोचता हूं आपदा की विस्मृति समाधान होती तो.

मानुष मन ठहरा जीवन जिधर दिखा वहीं संसार की बेल चढ़ा दी. एक अग्रज लेखक कहते हैं माहमारी ने मृत्यु की गरिमा छीन ली. मैं कहता हूं महामारी जब जाएगी तो जीवन की कीमत बता जाएगी.

सांझ की बेला चढ़ गई है.
आज मातृत्व दिवस था. मां दिया बत्ती कर सब्जी काट रही है.
मैं सुबह सुबह फिर मृत्यु के आंकड़े देखूंगा
चाय पीते हुए..!


स्मृतियों का न होना..!


                                            हरदा के पास कुकरावद गांव की एक सांझ. फोटो-शीतल 

कई स्मृतियां एकदम ठंडी होती हैं. बेजान. जैसे विस्मृति के मुहाने पर पड़ा अंजान और सबसे अजनबी टुकड़ा. या फिर की कोई धुंधला दृश्य जिसे भुलाना भी भुला दिया गया हो. स्मृति के ये सबसे ठंडे टुकड़े मुझे उस समय सबसे ज्यादा याद आए जबकि मैं विस्मृति के सबसे सुखद समय में था. मैं उन चेहरों, बातों और मुलाकातों को कभी भूल नहीं पाया जिन्हें मैं कभी समझ नहीं पाया.

कुछ स्मृतियों का न होना दरअसल सबसे ज्यादा सबकुछ होता है. जैसे सबसे ज्यादा पहचानना अजनबी को होता है. चिह्नित वही होता है जो होता है. होना भर सच में "बहुत कुछ" होता है..

सबसे ज्यादा मायने रखता है. याद का सबसे आखिरी कोना क्योंकि भुलाया वही जाता है जो होता है..  जो "था" उसका होना भर बहुत कुछ होता है न रहने के बाद भी..!

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

बाजार से बडा ब्रैंड और क्रिकेटर से बडा व्यक्‍तित्‍व


                                                                           
                                                                               सारंग उपाध्‍याय


आर्थिक विषमता, बेकारी, बंद होती कंपनियों और मंदी के घटाटोप अंधेरे के इस दौर में भारतीय क्रिकेट, पूंजी और समृद्धि का एक अद्भुत टिमटिमाता तारा है. इस तारे की मद्धम और झीनी रोशनी से देसी अर्थव्‍यवस्‍था जगमग होती रही है, तो दुनिया के कई कंगाल होते, तंगी झेल रहे क्रिकेट बोर्ड भी राहत की रोशनी पाते रहे हैं. यह बताने की जरूरत नहीं कि रोजाना देश के आर्थिक महाशक्‍ति होने के अलापे जाने वाले राग के बीच बीसीसीआई सालों से क्रिकेट की आर्थिक महाशक्‍ति है और हाल ही में साउथ अफ्रीका बोर्ड का बीसीसीआई को बिना बताए भारत अफ्रीका मैचों की तारीख फिक्‍स करने का नतीजा उसे क्रिकेट की दुनिया का किस तरह का अमेरिका घोषित करता है. 

बहरहाल, अमीर क्रिकेट बोर्ड की दुनिया को लेकर इतनी बातें इसलिए कि इसमें रहने वाले क्रिकेट की दुनिया के कुबेरपति सचिन अपने घरेलू मैदान मुंबई के वानखेडे पर आज से अपना 200वां अंतिम टेस्‍ट मैच खेलने उतरेंगे. ऐसे में सवाल यह उठता है कि उनके संन्‍यास के बाद पिछले डेढ से ज्‍यादा दशकों से भारत में कई बडी देसी विदेशी कंपनियों के लिए मुनाफे का मोहजाल फैलाने वाले सचिन की लोकप्रियता का ग्राफ क्‍या कम होगा?  क्‍या विज्ञापन की दुनिया के इस किमियागार पर पहले की तरह कंपनियां मेहरबान होंगी? और क्‍या भारतीय खेलों की दुनिया के सबसे बडे ब्रैंड स्‍वर्गीय रमेश तेंदुलकर के इस छोटे लडके की विज्ञापनी माया ढलने तो नहीं लगेगी?  जब तक रन बनते रहे मुनाफे की बावली कंपनियां सचिन के पैड, बैट, हैलमेट, जूते और शर्ट के खीसे तक को भुनाती रही, फिलहाल तो वे खुद ही एक ब्रैंड बन चुके हैं जो बाजार से बडा है. 

इस समय उनके पास 16 ब्रैंड के कॉन्‍ट्रेक्‍ट हैं, हां धोनी और विराट कोहली पिछले कुछ सालों से उन्‍हें लगातार चुनौती दे रहे हैं. इसमें भी कोहली की धमक ज्‍यादा है, इस रूप में  कि सचिन के एडिडास के ब्रैंड एम्‍बेसडर रहते हुए भी इस कंपनी ने कोहली से 10 करोड सालाना का नया गठबंधन किया है. ऐसे में बाजार विशेषज्ञ लगातार इस सवाल को उठाते रहे हैं कि सचिन जल्‍द ही ब्रैंडिंग की दुनिया में पिछड जाएंगे और उनकी लोकप्रियता हाशिये पर चली जाएगी. 

खैर, बात सही भी है क्‍योंकि कोहली के रूप में यह दिखाई दे रहा है और इस रूप में भी कि पूंजीवादी व्‍यवस्‍था में मुनाफे की कोई निष्‍ठा और ईमान नहीं होता, वह अवसरवादी होती है. जाहिर है बात सही हो सकती है, लेकिन कुछ सवालों के बीच, जो उठना लाजिमी है और बिल्कुल भी नये नहीं है कि क्‍या सचिन की लोकप्रियता से बडी उनकी प्रतिष्‍ठा नहीं है और क्‍या लोकप्रियता से ज्‍यादा उनकी प्रतिष्‍ठा ने उन्‍हें ब्रैंडिंग का सरताज नहीं बनाया. कौन नहीं जानता कि फिक्‍सिंग, सट्टेबाजी और आईपीएल जैसे फॉर्मेट की चमकती रातों में लगातार काले हो रहे क्रिकेट में सचिन आज भी चारित्रिक रूप से उतने ही धवल, उजले और सम्‍मानित होकर हमारे सामने हैं, जितना कि कोई अंजान नया चेहरा. 

सचिन के एक बेहतरीन क्रिकेटर होने से बडी खासियत मैं यह मानता हूं कि पिछले 24 सालों के उनके क्रिकेट कॅरियर में उनके चरित्र पर न तो कोई दाग लगा, न वे किसी सट्टेबाजी या फिक्‍सिंग स्‍कैंडल में फंसे, यहां तक कि एक सिंगल फोटो भी ऐसी नहीं रही जो उनके नाम पर विवाद पैदा करती. विनम्रता, निष्‍ठा, प्रतिष्‍ठा और चरित्र सचिन की वास्‍तविक ब्रैंडिंग करते हैं. एक नजरिये से देखा जाए तो दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र की संसद के सर्वोच्‍च सदन राज्‍यसभा में सदस्‍य के रूप में वे दुनिया के और भी बडे व प्रतिष्‍ठित ब्रैंड बनकर सामने आए हैं, अब तो उन्‍हें खेलमंत्री बनाए जाने के सपने हवा में घुलने लगे हैं. जाहिर है ऐसे में संभावना इस बात की भी है कि कंपनियां उनकी लोकप्रियता को नहीं बल्‍कि अब उनकी प्रतिष्‍ठा पर पैसा लगाएं. सचिन से जुडने का उनका मकसद महज उत्‍पाद की बिक्री बढाना नहीं बल्‍कि उत्‍पाद की क्‍वॉलिटी बनाना हो. 

मुंबई में कांदीवली जिम खाना क्‍लब उनके नाम से हो जाने की आहट उनकी कीर्ति की पवित्रता का विस्‍तार है, जो देखना होगा कि कहां तक जाकर फैलती है? पवित्रता शब्‍द का इस्‍तेमाल यहां इसलिए कि यह उनकी क्रिकेट प्रतिभा की उस महानता को दर्शाता है, जब खेल का मतलब देशभक्‍ति था, राष्‍ट्र की सेवा था और हर प्रशंसक के मन में देश के प्रति भावना और आत्‍मीयता का आलोक पैदा करता था. बहरहाल, अपने अंतिम टेस्‍ट के लिए मुंबई के इस पोरगे को और देशभक्‍त को शुभकामनाएं, इस इच्‍छा के साथ की उनके क्रिकेट से भी ज्‍यादा प्रभावशाली उनके व्‍यक्‍तित्‍व का विस्‍तार होगा और वह खेल की दुनिया में अतुलनीय होगा. 

बैस्‍ट लक ऑफ सचिन...!  
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